ईरान में अशांति से चाबहार परियोजना पर मंडराया खतरा
ईरान में जारी व्यापक सरकार-विरोधी प्रदर्शनों और गहराते आर्थिक संकट ने भारत के सबसे महत्वपूर्ण विदेशी रणनीतिक निवेश, चाबहार बंदरगाह, के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा दिए हैं। खुफिया सूत्रों और राजनयिक आकलनों के अनुसार, ईरान के सभी 31 प्रांतों के 150 से अधिक शहरों में फैली यह अशांति भारत द्वारा संचालित ‘शाहिद बेहेश्ती’ टर्मिनल की सुरक्षा और संचालन के लिए सीधा खतरा बन गई है।
9 जनवरी 2026 तक, ईरान में स्थिति बेहद अस्थिर बनी हुई है। ईरानी रियाल में रिकॉर्ड गिरावट (1.5 मिलियन रियाल प्रति डॉलर) और 2025 के अंत में इज़राइल के साथ हुए “12-दिवसीय युद्ध” के कारण चरमराई ऊर्जा व्यवस्था ने जनता के गुस्से को भड़का दिया है। भारत के लिए यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि नई दिल्ली ने इस बंदरगाह में लगभग $500 मिलियन का निवेश किया है। चाबहार को भारत की “कनेक्ट सेंट्रल एशिया” नीति की धुरी और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के विकल्प के रूप में देखा जाता है।
खुफिया रिपोर्ट और परिचालन जोखिम
शीर्ष खुफिया सूत्रों ने कई “रणनीतिक जोखिमों” की पहचान की है जो भारत की पहुंच रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं। मुख्य चिंता इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के बाधित होने की है।
-
आपूर्ति श्रृंखला में बाधा: देशव्यापी हड़तालों और इंटरनेट ब्लैकआउट ने माल ढुलाई के समन्वय को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में, जहाँ चाबहार स्थित है, स्थानीय विद्रोहियों ने सुरक्षा बलों पर हमले तेज कर दिए हैं।
-
रेलवे कनेक्टिविटी में देरी: चाबहार-जाहेदान रेलवे परियोजना, जो बंदरगाह को ईरान के रेल नेटवर्क से जोड़ती है, श्रम अशांति और धन की कमी के कारण रुक सकती है। इसके बिना, चाबहार की उपयोगिता सीमित रह जाएगी।
-
सुरक्षा बलों का मनोबल: खुफिया जानकारी के अनुसार, मुद्रास्फीति (42.2%) के कारण सुरक्षा के लिए जिम्मेदार ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के निचले स्तर के कैडरों में भी असंतोष है, जो सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर कर सकता है।
“मैक्सिमम प्रेशर” और अमेरिकी प्रतिबंधों का साया
ईरान में यह अस्थिरता ऐसे समय में आई है जब वाशिंगटन में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने तेहरान के खिलाफ अपनी “मैक्सिमम प्रेशर” (अधिकतम दबाव) नीति फिर से शुरू कर दी है। हालांकि भारत ने अप्रैल 2026 तक चाबहार में संचालन जारी रखने के लिए छह महीने की प्रतिबंध छूट प्राप्त कर ली है, लेकिन दीर्घकालिक भविष्य धुंधला है। 2025 के अंत में छूट रद्द होने से पहले ही भारतीय शिपिंग उद्योग में हलचल मच गई थी।
भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फथली ने हाल ही में कहा, “चाबहार बंदरगाह केवल एक आर्थिक परियोजना नहीं है; यह क्षेत्रीय कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए एक रणनीतिक और दीर्घकालिक पहल है। इस सहयोग को अस्थायी कारकों या बाहरी दबावों से प्रभावित नहीं होना चाहिए।”
चाबहार बनाम ग्वादर: भू-राजनीतिक बिसात
भारत के लिए, यह बंदरगाह पाकिस्तान में चीन द्वारा विकसित ग्वादर बंदरगाह (जो यहाँ से मात्र 170 किमी दूर है) का जवाब है। चाबहार के माध्यम से भारत अरब सागर में चीनी नौसैनिक गतिविधियों पर नज़र रख सकता है और पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक मानवीय सहायता पहुँचा सकता है।
अधिकारियों को डर है कि यदि अशांति या प्रतिबंधों के कारण चाबहार में भारत का काम रुकता है, तो चीन—जिसने ईरान के साथ 25 साल की रणनीतिक साझेदारी की है—वहाँ अपनी पैठ बढ़ा सकता है, जिससे भारत की वर्षों की मेहनत पर पानी फिर सकता है।
निष्कर्ष और आगामी कदम
इन चुनौतियों के बावजूद, राजनयिक स्तर पर बातचीत जारी है। भारत और ईरान अपने द्विपक्षीय संबंधों की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, और इस महीने के अंत में ईरानी विदेश मंत्री की भारत यात्रा प्रस्तावित है। भारत इस दौरान बंदरगाह और रेल संपर्कों के लिए ठोस सुरक्षा गारंटी की मांग कर सकता है। फिलहाल, नई दिल्ली “सतर्क जुड़ाव” की नीति अपना रही है, ताकि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और अमेरिकी दबाव के बीच संतुलन बना सके।