ऊषा उत्थुप के सुरों पर झूम उठा विरासत का मंच, यादगार संध्या के साथ महोत्सव का समापन – BBN Bharat

ऊषा उत्थुप के सुरों पर झूम उठा विरासत का मंच, यादगार संध्या के साथ महोत्सव का समापन

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-पंडित राजन सजौर की खयाल गायकी ने बांधा समां, होपटाउन स्कूल की छात्राओं ने ऑर्केस्ट्रा से मोहा मन

देहरादून। पंद्रह दिवसीय विरासत कला एवं संस्कृति महोत्सव-2026 का शुक्रवार को भव्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ समापन हो गया। गढ़ी कैंट स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित अंतिम सांस्कृतिक संध्या में शास्त्रीय संगीत की मिठास और लोकप्रिय गीतों की धूम का अनूठा संगम देखने को मिला। गया घराने के शास्त्रीय गायक पंडित राजन सजौर की खयाल गायकी से शुरू हुई संगीत संध्या को विश्वविख्यात गायिका ऊषा उत्थुप ने अपने दमदार और जोशीले गायन से यादगार बना दिया। उनकी लोकप्रिय गीतों की प्रस्तुति पर दर्शक देर रात तक झूमते रहे।

रिच संस्था की ओर से आयोजित 15 दिवसीय महोत्सव में देश के विभिन्न शास्त्रीय संगीत घरानों के कलाकारों, लोक कलाकारों और सांस्कृतिक हस्तियों ने अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों को भारतीय कला एवं संस्कृति के विविध रंगों से परिचित कराया। अंतिम दिन भी हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र में संगीत प्रेमियों की भारी भीड़ उमड़ी।

पंडित राजन सजौर की खयाल गायकी ने बांधा समां

समापन संध्या की शुरुआत पंडित राजन सजौर की शास्त्रीय गायकी से हुई। उन्होंने राग देश में खयाल गायकी प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी पहली बंदिश मध्य लय में एकताल और दूसरी द्रुत लय में तीनताल पर आधारित रही। दोनों बंदिशों में राग की भावपूर्ण अभिव्यक्ति और लयकारी का सुंदर समन्वय देखने को मिला।

हारमोनियम पर पंडित धर्मनाथ मिश्रा ने सधी हुई संगत से प्रस्तुति को और प्रभावशाली बनाया। दोनों कलाकारों के बीच सुरों और ताल का शानदार सामंजस्य देखने को मिला।

गया घराने का प्रतिनिधित्व करने वाले पंडित राजन सजौर शास्त्रीय गायन और ठुमरी के प्रमुख कलाकार हैं। उन्होंने पंडित जय राम तिवारी से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और बाद में पंडित कामेश्वर पाठक के सानिध्य में एक दशक से अधिक समय तक प्रशिक्षण लिया। स्वर्गीय पंडित रामजी मिश्र की गया घराने की समृद्ध ठुमरी और होली गायन परंपरा को संरक्षित करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने पंडित राजन और साजन मिश्रा से भी खयाल एवं ठुमरी गायकी की बारीकियां सीखीं।

साहित्य कला परिषद के ठुमरी महोत्सव, झंकार उत्सव और आरोहण संगीत कार्यक्रम सहित कई प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुके सजौर बिहार के गया स्थित सुर सलिला गया जी गुरुकुल में बच्चों को निशुल्क संगीत प्रशिक्षण भी देते हैं। उन्हें आकाशवाणी के ‘बी-हाई’ श्रेणी के कलाकार के रूप में पहचान मिली है।

ऊषा उत्थुप के गीतों पर देर रात तक झूमते रहे दर्शक

समापन संध्या का मुख्य आकर्षण लोकप्रिय गायिका ऊषा उत्थुप की प्रस्तुति रही। अपनी विशिष्ट आवाज, ऊर्जावान अंदाज और लोकप्रिय गीतों के साथ उन्होंने मंच पर कदम रखा तो पूरा परिसर तालियों और उत्साह से गूंज उठा। उनके चंचल और जोशीले गायन ने युवाओं को खास तौर पर आकर्षित किया। दर्शक उनके गीतों पर झूमते और गुनगुनाते नजर आए।

ऊषा उत्थुप ने अपनी प्रस्तुति से विरासत की अंतिम संध्या को संगीत, मनोरंजन और उल्लास से सराबोर कर दिया। उनके साथ शुभोजित धर ने की-बोर्ड, नेपाल शाह ने बेस गिटार, सिद्धार्थ चटर्जी ने ऑक्टापैड और संपद सामंत ने लीड गिटार पर संगत की।

पांच दशक से अधिक समय से संगीत जगत में सक्रिय ऊषा उत्थुप भारतीय लोकप्रिय संगीत की विशिष्ट पहचान हैं। वर्ष 1969 में चेन्नई के नाइन जेम्स नाइट क्लब से शुरू हुआ उनका संगीत सफर आज भी जारी है। वह 17 भारतीय और आठ विदेशी भाषाओं में गीत गा चुकी हैं। उनकी गायकी में भारतीय सांस्कृतिक पहचान और वैश्विक संगीत का अनूठा मेल देखने को मिलता है।

पारंपरिक भारतीय वेशभूषा में आधुनिक गीतों की प्रस्तुति उनकी विशिष्ट पहचान है। उन्होंने अपने संगीत के माध्यम से प्रेम, एकता, शांति, सद्भाव और सहिष्णुता का संदेश दिया है। संगीत के साथ सामाजिक कार्यों में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। उन्होंने मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चैरिटी सहित विभिन्न संस्थाओं के लिए काम किया और महिला सशक्तीकरण, बाल कल्याण तथा स्वास्थ्य संबंधी अभियानों से भी जुड़ी रहीं।

संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2011 में पद्मश्री और वर्ष 2024 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। गायिका के साथ-साथ उन्होंने फिल्मों में अभिनय भी किया है।

होपटाउन स्कूल की छात्राओं ने ऑर्केस्ट्रा से सजाई संध्या

विरासत महोत्सव की अंतिम सांस्कृतिक संध्या में होपटाउन स्कूल की छात्राओं ने ऑर्केस्ट्रा की शानदार प्रस्तुति देकर दर्शकों का मन मोह लिया। विभिन्न वाद्य यंत्रों और मधुर स्वरों के समन्वय से सजी प्रस्तुति में ताल, लय और सुरों का सुंदर सामंजस्य देखने को मिला।

ऑर्केस्ट्रा में ड्रम पर जसमीरा भूटानी, ऑक्टापैड पर शिक्षक गोमित शाह, की-बोर्ड पर मिशिका अग्रवाल और शिक्षक सागर गुसाईं ने संगत की। गायन में गायत्री जुयाल, सान्वी अरोड़ा, गीत सिद्धार्थ डागा, अहेली दत्ता और शिक्षिका सुमन आनंद ने अपनी आवाज का जादू बिखेरा।

तबले पर काश्वी धीमिजा और शिक्षक दिवाकर गांगुली, कैजोन पर सिया रायवानी, दरबुका पर ऋषिका सिंह तथा जेंबे पर हृदन्या आनंद ने तालबद्ध संगत की। गिटार पर शिक्षक दीपक थापा और समन्वय देसवाल ने प्रस्तुति को और मधुर बनाया।

छात्राओं और शिक्षकों की सामूहिक प्रस्तुति ने दर्शकों को संगीत की विविधता से परिचित कराया। इसके साथ ही 15 दिवसीय विरासत महोत्सव का समापन संगीत, संस्कृति और यादगार पलों के साथ हुआ।

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