इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में अंकित है वीर शिरोमणि भड़ माधोसिंह भण्डारी के द्वितीय पुत्र गजेसिंह भण्डारी की गौरवशाली वंश परम्परा

0

–वीरेन्द्र सिंह भण्डारी–

घनसाली/ टिहरी। हिमालय की सुरम्य पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य अवस्थित पट्टी ग्यारह गाँव के अंतर्गत स्थित ग्राम सरूणा केवल प्राकृतिक सौन्दर्य से ही समृद्ध नहीं है, बल्कि यह गढ़वाल के स्वर्णिम इतिहास, वीरता और गौरवपूर्ण वंश परम्पराओं का भी एक महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। यह वही पावन भूमि है जहाँ वीर शिरोमणि भड़ माधोसिंह भण्डारी के वंशजों ने अपनी गौरवशाली परम्परा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा। विशेष रूप से उनके द्वितीय पुत्र  गजेसिंह भण्डारी की अंश-वंशावली आज भी जाख, सरूणा तथा आली गाँव में अपनी ऐतिहासिक पहचान, सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक विरासत के साथ निरंतर आगे बढ़ रही है।
ऐतिहासिक परम्पराओं के अनुसार गजेसिंह भण्डारी को जाख गाँव की विरासत प्राप्त हुई थी। वे अपने पिता वीर शिरोमणि भड़ माधोसिंह भण्डारी की भाँति साहसी, दूरदर्शी तथा अपने कुल की मर्यादाओं के रक्षक माने जाते थे। जाख गाँव में उन्होंने अपने परिवार और वंश की सुदृढ़ नींव स्थापित की, जो समय के साथ एक विशाल वंशवृक्ष के रूप में विकसित हुई।
 गजेसिंह भण्डारी के एक पुत्र हुए, जिनका नाम अजमेर सिंह भण्डारी था। आगे चलकर अजमेर सिंह भण्डारी के तीन पुत्र हुए—अमरचंद सिंह भण्डारी, रूद्रसिंह भण्डारी तथा मंगलसिंह भण्डारी। इन तीनों भाइयों ने अपने समय में भण्डारी वंश की प्रतिष्ठा को बनाए रखा तथा पारिवारिक एकता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।
इतिहास में उल्लेख मिलता है कि  अमरचंद सिंह भण्डारी की कोई संतान नहीं थी। अपने जीवनकाल में उन्होंने दूरदर्शिता, उदारता और परिवार के प्रति समर्पण का परिचय देते हुए अपनी सम्पूर्ण पैतृक विरासत अपने दोनों छोटे भाइयों रूद्रसिंह भण्डारी एवं मंगलसिंह भण्डारी के नाम समर्पित कर दी। उनका यह निर्णय केवल सम्पत्ति के हस्तांतरण तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने भण्डारी वंश की निरन्तरता और पारिवारिक एकता को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।
इसी के उपरान्त रूद्रसिंह भण्डारी और मंगलसिंह भण्डारी की अंश-वंशावली निरंतर विकसित होती रही। आज उनके वंशज जाख, सरूणा तथा आली गाँव में बड़ी संख्या में निवास करते हैं। उन्होंने अपने पूर्वजों की वीरता, स्वाभिमान, लोकसेवा, धार्मिक आस्था तथा सामाजिक मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखा है। यही कारण है कि यह वंश आज भी क्षेत्र की सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
भण्डारी वंश का यह इतिहास केवल एक परिवार की वंशावली नहीं, बल्कि गढ़वाल की उस गौरवशाली परम्परा का सजीव दस्तावेज़ है, जिसने सदियों से त्याग, पराक्रम, निष्ठा और संस्कृति के मूल्यों को संरक्षित रखा है। आने वाली पीढ़ियों के लिए यह विरासत प्रेरणा का स्रोत है तथा उन्हें अपने गौरवपूर्ण अतीत से जोड़ने का कार्य करती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इस प्रकार की ऐतिहासिक वंशावलियों का संरक्षण, शोध एवं प्रामाणिक दस्तावेजीकरण किया जाए, जिससे गढ़वाल का गौरवशाली इतिहास आने वाली पीढ़ियों तक यथार्थ रूप में पहुँच सके। वीर शिरोमणि भड़ माधोसिंह भण्डारी के वंशजों की यह गौरवगाथा न केवल भण्डारी समाज, बल्कि सम्पूर्ण उत्तराखण्ड की अमूल्य धरोहर है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.