..उत्तराखंड के दीवानों का यह सपना पूरा होगा, देख लेना एक दिन… – BBN Bharat

..उत्तराखंड के दीवानों का यह सपना पूरा होगा, देख लेना एक दिन…

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-उत्तराखंड स्थापना दिवस, 9 नवंबर विशेष

 

हेमचंद्र सकलानी

देहरादून। उत्तराखंड राज्य का सपना केवल एक भौगोलिक क्षेत्र को अलग पहचान दिलाने का सपना नहीं था। यह पहाड़ की अस्मिता, संस्कृति, स्वाभिमान, विकास और अपने लोगों के बेहतर भविष्य की लड़ाई थी। इस सपने को साकार करने के लिए हजारों लोगों ने संघर्ष किया, लाठियां खाईं, गोलियां झेलीं और अनेक आंदोलनकारियों ने अपने प्राणों तक की आहुति दे दी।9 नवंबर को जब उत्तराखंड अपने स्थापना दिवस का उत्सव मनाता है, तब उन संघर्षों की स्मृतियां अनायास ही मन में उमड़ने लगती हैं। आंदोलन के वे दिन, सड़कों पर गूंजते नारे, मशाल जुलूस, शहादतों का दर्द और एक अलग राज्य के निर्माण की अदम्य इच्छा आज भी स्मृतियों में जीवंत है। लेकिन राज्य गठन के बाद एक सवाल बार-बार मन को कचोटता है—क्या हमने उसी उत्तराखंड की कल्पना की थी, जिसके लिए इतना बड़ा संघर्ष किया गया था?

अलग राज्य की सोच और मेरी शुरुआती स्मृतियां

सन 1938 में श्रीनगर में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि उत्तराखंड की अपनी विशिष्ट भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान है तथा यहां की जनता को इसे बनाए रखने का अधिकार है। राष्ट्रीय स्तर के इतने बड़े नेता द्वारा इस क्षेत्र की विशिष्ट पहचान की बात किया जाना अपने आप में महत्वपूर्ण था।

मेरा बचपन टिहरी के परिवार गांव में बीता। चौथी तक की शिक्षा सोनार देवी पाठशाला और भागीरथी के किनारे पुल के निकट स्थित सरस्वती विद्या मंदिर में हुई। सन 1984 में जब मैं अलीगढ़ में था, तब पहली बार पृथक उत्तराखंड राज्य की सुगबुगाहट का अहसास हुआ। हालांकि इससे पहले भी अलग राज्य को लेकर चर्चाएं उठती रही थीं, लेकिन उस समय यह विचार मेरे मन में गहराई से बैठने लगा था।

इसी वर्ष मेरा स्थानांतरण देहरादून हो गया। उत्तराखंड राज्य के प्रति मेरी इच्छा और आकांक्षा लगातार प्रबल होती रही। इसका प्रमाण यह है कि वर्ष 1986 में मैंने ‘उत्तराखंड के साथ न्याय की जरूरत’ शीर्षक से एक लेख लिखकर दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली को भेजा। जब वह लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे सुखद आश्चर्य हुआ। लगा कि मेरी सोच केवल मेरी नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों की आवाज है जो पहाड़ के लिए न्याय चाहते हैं। इसके बाद मेरा स्थानांतरण चिन्यालीसौड़ स्थित निर्माणाधीन मनेरी भाली परियोजना में हो गया। वहां सिंचाई विभाग और हाइडिल के कई प्रभाग थे। गांव ऊंची पहाड़ियों पर दूर-दूर बसे हुए थे। कॉलोनी के नीचे उत्तरकाशी-टिहरी मार्ग पर एक इंटर कॉलेज और कुछ दुकानें थीं। लेखन और क्रिकेट के कारण वहां शीघ्र ही मेरी अच्छी पहचान बन गई।

आरक्षण विरोधी आंदोलन से पृथक राज्य की लड़ाई तक

16 जून 1994 को शिक्षा में आरक्षण की घोषणा के साथ ही आरक्षण विरोधी आंदोलन अचानक तेज हो उठा। धीरे-धीरे इस आंदोलन ने पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को अपने भीतर समाहित कर लिया। आरक्षण विरोध का आंदोलन अब केवल आरक्षण तक सीमित नहीं रह गया था। उसके केंद्र में एक ही उद्देश्य था—पृथक उत्तराखंड राज्य। ‘आज दो, अभी दो, उत्तराखंड राज्य दो’ जैसे नारों से पहाड़ की घाटियां, पगडंडियां और सड़कें गूंजने लगीं।

उत्तरकाशी में आंदोलन अभी अपेक्षाकृत शांत था कि 1 सितंबर को खटीमा गोलीकांड की खबर आई। उसी शाम चिन्यालीसौड़ की पीपल मंडी में घूमते हुए मसूरी गोलीकांड में आठ लोगों की मृत्यु का समाचार मिला।हम सभी स्तब्ध रह गए। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है। लोग एक-दूसरे से मिलकर सच्चाई जानने की कोशिश कर रहे थे। मसूरी की टेलीफोन लाइनें बंद थीं, इसलिए वहां से कोई खबर नहीं मिल पा रही थी। विश्वास तब हुआ जब आकाशवाणी से समाचार सुना।

पूरी कॉलोनी और बाजार में मातम छा गया।

अगली सुबह लगभग दस बजे मैंने प्रीतम सिंह पंवार, शूरवीर सिंह रांगड़, रावत, नौटियाल, सत्य प्रसाद रमोला सहित अनेक साथियों के साथ सैकड़ों लोगों को एकत्रित किया। बाजार की दुकानें और कार्यालय बंद करा दिए गए।

इसके बाद बंद, जुलूस और प्रदर्शन चिन्यालीसौड़ में प्रतिदिन का कार्यक्रम बन गए। टिहरी, पौड़ी, श्रीनगर, देहरादून और ऋषिकेश से आने वाली आंदोलन की खबरें चिन्यालीसौड़ के आंदोलनकारियों में नया जोश भर देती थीं।

आंदोलन में कविता की शक्ति

जल्द ही राजकीय इंटर कॉलेज चिन्यालीसौड़ के प्राध्यापक प्रह्लाद सिंह बिष्ट भी आंदोलनकारियों के साथ आ गए। खटीमा और मसूरी गोलीकांड ने वातावरण को और अधिक आक्रोशपूर्ण बना दिया था। ब्लॉक कार्यालय में अनशन शुरू हो गया था।ग्राम प्रधान एवं अधिवक्ता बलवीर सिंह बिष्ट भी आंदोलन में सक्रिय हो गए। वे हमारे साथ जुलूसों का नेतृत्व करते थे।एक दिन सड़क पर चलते हुए उन्होंने मुझसे कहा, “सकलानी जी, कुछ ऐसा लिखिए, कोई अच्छी कविता लिखिए जो सभा में लोगों के भीतर जोश भर दे।” जुलूस में चलते-चलते मेरे भीतर भावों का ऐसा मंथन हुआ कि लगभग दस मिनट में मैंने ‘जन्म इसे लेने दो’ कविता लिख दी। जहां बलवीर सिंह जी बैठे थे, वहीं दीवार पर कविता टांग दी। कविता सभी को बहुत पसंद आई। बाद में यह अनेक स्थानों पर प्रकाशित हुई।

सुंदरलाल बहुगुणा ने इसे अपनी पुस्तक ‘उत्तराखंड अत्याचार एवं पुकार’ में स्थान दिया। कोटद्वार के पद्मेश बुडाकोटी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘उत्तराखंड आंदोलन का दस्तावेज’ की शुरुआत इसी कविता से की। मुंबई से प्रकाशित एक पुस्तक में भी इसे शामिल किया गया। दैनिक जागरण ने अपने रविवारीय परिशिष्ट में इसे आकर्षक ढंग से प्रकाशित किया। बाद में श्रीनगर से प्रकाशित ‘वर्तमान उत्तराखंड’ पत्रिका ने भी इसे स्थान दिया। यह मेरे लिए केवल कविता नहीं थी, बल्कि उस समय की जनभावनाओं की अभिव्यक्ति थी।

चिन्यालीसौड़ में आंदोलन की तपिश

चिन्यालीसौड़ में रोज बाजार, कार्यालयों और विद्यालयों को बंद कराने के लिए जुलूस निकाले जाते। सभाओं में उत्तेजक भाषण होते और हर दूसरे दिन पुतले फूंके जाते। एक दिन बाजार में मैंने मुलायम सिंह यादव और नरसिंह राव की मृत्यु की घोषणा कर एक मिनट का मौन भी रखवा दिया। इस पर उनके समर्थक मुझसे काफी नाराज हुए। एक शाम सात बजे हमने मशाल जुलूस निकाला। इसके जवाब में मैंने छोटे बच्चों का जुलूस रात बारह बजे निकलवाया। 16 अगस्त को शिशु मंदिर विद्यालय में उत्तराखंड राज्य विषय पर एक गोष्ठी आयोजित की गई। इसका संचालन मैंने किया और अध्यक्षता प्रधानाचार्य तिवारी जी ने की। गोष्ठी में अनेक लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए।

अगले दिन टिहरी से आंदोलनकारियों की एक टीम आई। उन्होंने मेरे घर पर आगामी कार्यक्रमों को लेकर बैठक की। आंदोलन के लिए धन एकत्र करने की शुरुआत भी हुई। जब मैंने सहयोग राशि देनी चाही तो आंदोलनकारियों ने यह कहते हुए लेने से इनकार कर दिया कि मैं पहले से ही आंदोलन के हित में बहुत कार्य कर रहा हूं। देहरादून में सुशील बलूनी, रविंद्र जुगरान, कमला पंत और रंजीत सिंह वर्मा से भी बीच-बीच में बातचीत होती रहती थी।

भूमिगत आंदोलनकारियों की जिम्मेदारी

इसी दौरान कुछ लोगों ने रात में धरासू स्थित वन विभाग के गोदाम से विस्फोटक चुरा लिया था। रात लगभग बारह बजे मुझे फोन आया कि कुछ लोगों ने विस्फोटक चोरी कर भागीरथी के किनारे छिपा दिया है। इस मामले में हम लोग भूमिगत हो रहे हैं। अब अगले दिन से समाचार पत्रों के लिए सारी रिपोर्टिंग आपको करनी होगी।

आंदोलन का यह दौर बेहद चुनौतीपूर्ण था। एक ओर राज्य की मांग को लेकर जनांदोलन लगातार तेज हो रहा था, दूसरी ओर आंदोलनकारियों पर कार्रवाई और गिरफ्तारी का खतरा भी बना हुआ था।

रामपुर तिराहा कांड और अंधेरे में डूबी दीपावली

रामपुर तिराहा कांड ने आंदोलनकारियों को भीतर तक झकझोर दिया था। उस घटना के बाद आंदोलन केवल राजनीतिक मांग नहीं रह गया था, बल्कि न्याय और सम्मान की लड़ाई बन गया था। दशहरे पर हमने घोषणा की कि कोई दशहरा नहीं मनाएगा। रावण के स्थान पर नरसिंह राव और मुलायम सिंह यादव के पुतले फूंके जाएंगे। दीपावली पर भी किसी ने अपने घर में दीपक तक नहीं जलाया। पूरा चिन्यालीसौड़, पीपल मंडी, बाजार और कॉलोनी अंधेरे में डूबे रहे।देश के इतिहास में यह एक अनोखी दीपावली थी। एक ऐसा पर्व, जिसे सामान्यतः प्रकाश, उल्लास और खुशियों का प्रतीक माना जाता है, उस दिन शहादतों की स्मृति और न्याय की मांग के नाम समर्पित था। एक रात बच्चों का जुलूस निकालने के लिए मैंने बच्चों को बुलाया। मेरी बेटी, जो मसूरी में तीसरी कक्षा में पढ़ती थी, आंदोलन के कारण विद्यालय बंद होने से चिन्यालीसौड़ आई हुई थी। मैंने उससे भी जुलूस में चलने को कहा। उसने सहजता से पूछा, “हमें क्या मिलेगा जुलूस में जाकर?” सकी बात सुनकर मुझे गुस्सा आ गया और मैंने उसके गाल पर थप्पड़ मार दिया। मैंने उससे कहा, “जिन्होंने अपनी जान दे दी, क्या वे कुछ पाने के लिए मरे थे?” बाद में मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। वह एक बच्ची थी। उसके प्रश्न में कोई दुर्भावना नहीं थी, बल्कि उसकी बालसुलभ जिज्ञासा थी। आज भी उस घटना को याद करता हूं तो मन में एक कसक उठती है।

आंदोलन की गूंज देशभर में

चिन्यालीसौड़ आंदोलन की खबरें सुनकर राजनाथ सिंह, मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र और साध्वी ऋतंभरा कुछ-कुछ दिन के अंतराल पर वहां पहुंचे। मैंने और अन्य आंदोलनकारियों ने उनका स्वागत किया।

एक दिन बाजार में सभा को संबोधित करते हुए मैंने लोगों से कहा था—

“एक दिन ऐसा आपके जीवन में अवश्य आएगा, जब आप अपने बच्चों को गर्व से बताएंगे कि आपने उत्तराखंड आंदोलन में किस तरह भाग लिया था।”

मेरा विश्वास था कि यह संघर्ष व्यर्थ नहीं जाएगा।

लेकिन समय बीतने के साथ सरकार के रवैये से लोग निराश होने लगे। छह वर्षों के संघर्ष के दौरान अनेक लोग हताश हो गए थे। यहां तक कि वे लोग भी, जिन्होंने आंदोलन में अभूतपूर्व योगदान दिया था।

चिन्यालीसौड़ की एक सभा में मैंने उत्तराखंड राज्य के लिए अपनी भावनाएं इन पंक्तियों के माध्यम से व्यक्त की थीं—

“न जुल्मों से रुका हूं, न गोलियों से दबूंगा,
मैं उत्तराखंड राज्य हूं, समय के माथे पर लिखा हूं।”

आंदोलनकारी के योगदान की अनदेखी

उत्तराखंड राज्य आंदोलन में मेरे योगदान को देखते हुए आंदोलन के प्रमुख नेता रणजीत सिंह वर्मा ने देहरादून से और बाद में विधायक बने प्रीतम सिंह पंवार ने उत्तरकाशी से मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मेरा नाम आंदोलनकारियों की सूची में शामिल करने का अनुरोध किया था।

लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

यह बात मेरे लिए व्यक्तिगत पीड़ा का विषय अवश्य रही, लेकिन आंदोलन में मेरा योगदान किसी प्रमाणपत्र या सम्मान की अपेक्षा से नहीं था। वह मेरे भीतर की उस भावना से जुड़ा था, जो पहाड़ के लिए न्याय और पृथक राज्य की आकांक्षा से जन्मी थी।

विधानसभा में प्रस्ताव और टूटती उम्मीदें

सन 1999 में मुझे किसी काम से लखनऊ जाना पड़ा। उसी ट्रेन में पर्वतीय क्षेत्र के कई विधायक भी यात्रा कर रहे थे। अगले दिन उत्तराखंड राज्य का प्रस्ताव विधानसभा में रखा जाना था।

मैं पहली बार विधानसभा की कार्यवाही देखने गया था। मेरी इच्छा थी कि प्रत्यक्ष देखूं कि पृथक राज्य का प्रस्ताव किस तरह पारित होता है।

लेकिन दुर्भाग्य से उस दिन सदन में ऐसा हंगामा हुआ कि प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया। सभी बेहद निराश थे।

वापसी में ट्रेन में विधायक निराश बैठे थे। उन्हें लग रहा था कि अब शायद उत्तराखंड राज्य बन ही नहीं पाएगा।

डाकपत्थर लौटने पर वहां भी लोगों ने कहा कि अब राज्य नहीं बन पाएगा।

लेकिन मैं लगातार यही कहता रहा कि विचार कभी मरता नहीं। समय, काल, परिस्थितियां और विरोधी शक्तियां चाहे कितना भी जोर लगा लें, किसी विचार को दबा नहीं सकतीं। जब भी उस विचार को ऊर्जा मिलेगी, वह बीज अवश्य अंकुरित होगा।

उत्तराखंड राज्य एक दिन जरूर बनेगा।

तब मैंने ये पंक्तियां लिखी थीं—

“उत्तराखंड के दीवानों का यह सपना पूरा होगा,
देख लेना एक दिन।

प्रसव पीड़ा की वेदना से जन्म लेगा हमारा राज्य,
देख लेना एक दिन।

यह गंगा-जमुना की धारा, बदरी-केदार की धरा,
क्या कहती है सुन।

बनेगा उत्तराखंड राज्य, कह रहे हैं पंच प्रयाग,
देख लेना एक दिन।

मौत बनकर होगा कोई खड़ा यदि हमारे सामने,
कभी नहीं डरेंगे हम।

देते रहेंगे तब तक हम कुर्बानियां,
जब तक न गिन सकोगे तुम।

गोलियों से छलनी कर दे या हमें अलकनंदा में फिंकवा दे,
देखना।

हम स्वर्ग जाएंगे, देवताओं के फूलों से सजकर,
शहीद कहलाएंगे।

उत्तराखंड है पूजा, तपस्या, उद्देश्य है हमारा,
हम हर कीमत पर पाएंगे।

नहीं मिलेगी तेरी आहुति तो अपनी आहुतियों से,
यह यज्ञ संपन्न कराएंगे।

राम, कृष्ण, गौतम, गांधी के इस देश में,
सभ्यता-संस्कृति के परिवेश में।

प्रेम से, शांति से नहीं दोगे तो तुम,
क्रांति से देंगे हम, देख लेना एक दिन।”

संघर्षों से जन्मा राज्य

यह वही बीज था, जो ऊर्जा पाते ही पीपल और बरगद के बीज की तरह सीमेंट की दीवार को फाड़कर बाहर निकला।

आखिरकार 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य का जन्म हुआ।

वह दिन केवल एक नए राज्य के गठन का दिन नहीं था, बल्कि उन हजारों आंदोलनकारियों के सपनों के साकार होने का दिन था, जिन्होंने वर्षों तक संघर्ष किया था।

हमने सोचा था कि अब पहाड़ों में विकास की नई इबारत लिखी जाएगी। गांवों में रोजगार के अवसर पैदा होंगे। शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। पलायन रुकेगा। पहाड़ का युवा अपने ही क्षेत्र में सम्मानजनक जीवन जी सकेगा।

लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो मन में अनेक सवाल उठते हैं।

क्या इसी उत्तराखंड के लिए लड़े थे हम?

राज्य बनने के बाद यहां के निवासियों ने अपने पर्वतीय मूल के सुंदर, स्वच्छ और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर गांवों को छोड़कर मैदानी क्षेत्रों की ओर पलायन क्यों किया?

यह सवाल उठता है और फिर एक मौन छा जाता है।

क्या उत्तराखंड केवल कुछ लोगों के लाभ के लिए बना था? जिन लोगों के पास कभी साइकिल तक नहीं थी, वे आज करोड़पति कैसे हो गए? क्या ईमानदारी से भी करोड़पति बना जा सकता है?

ये सवाल किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के लिए हैं, जिसने राज्य आंदोलन के मूल उद्देश्यों को कहीं पीछे छोड़ दिया।

राज्य आंदोलन में शामिल रहे लोगों की पीड़ा आज भी इन पंक्तियों में सुनाई देती है—

“क्या सोचकर उतरे थे हम सब, राज्य की लड़ाई में,
गैरों से तब जीते थे हम, अपनों से अब हारे लड़ाई में।

वो गलियां अब याद आती हैं, वो सड़कें याद आती हैं,
लगाए थे हमने जहां कभी, गगनभेदी नारे लड़ाई में।

ओ खटीमा, ओ मसूरी, तुम्हीं बताओ पंत-बलूनी,
मिलेगा राज्य ऐसा, क्या कभी सोचा था लड़ाई में?

ओह, सिंह रणजीत ने वाले, ये उदासी क्यों है पसरी,
कहां है आदर्श राज्य का सपना, जो देखा था लड़ाई में?

अब कहां वो गीतों की गंगा, कहां कलमों की मशालें,
लगाई थी जिन्होंने आग, एक दिन पानी पर लड़ाई में।

ओ बदरी-केदार बताओ, ओ गंगा की धारा बताओ,
खो गए हैं वो लोग कहां, जो उतरे थे कभी लड़ाई में।”

स्थापना दिवस पर आत्ममंथन जरूरी

उत्तराखंड राज्य आंदोलन का इतिहास केवल संघर्षों, जुलूसों और शहादतों का इतिहास नहीं है। यह एक ऐसे विचार का इतिहास है, जो दशकों तक लोगों के मन में जीवित रहा और अंततः एक राज्य के रूप में साकार हुआ।

आज 9 नवंबर को जब हम उत्तराखंड स्थापना दिवस मनाते हैं, तब उन आंदोलनकारियों को याद करना हमारा दायित्व है, जिन्होंने अपने जीवन का अमूल्य समय इस संघर्ष को समर्पित किया।

लेकिन केवल स्मरण पर्याप्त नहीं है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम उन सपनों और उद्देश्यों का भी मूल्यांकन करें, जिनके लिए उत्तराखंड राज्य की मांग उठी थी।

क्या पहाड़ के गांव आबाद हुए? क्या पलायन रुका? क्या युवाओं को रोजगार मिला? क्या शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं गांवों तक पहुंचीं? क्या प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों का अधिकार सुरक्षित हुआ?

इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि हम आंदोलनकारियों के सपनों के उत्तराखंड के कितने करीब पहुंचे हैं।

राज्य आंदोलन की वह आवाज आज भी मेरे भीतर गूंजती है। वह आवाज, जिसने कभी कहा था—

“मैं उत्तराखंड राज्य हूं, समय के माथे पर लिखा हूं।”

यह आवाज आज भी जीवित है। जरूरत केवल इतनी है कि हम इसे सुनें और उस उत्तराखंड के निर्माण के लिए फिर संकल्प लें, जिसका सपना हमने आंदोलन के दिनों में देखा था।

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