26 साल का उत्तराखंडः विकास की चमक, पलायन का दर्द
देहरादून। उत्तराखंड ने 26 वर्षों में बहुत कुछ पाया है, लेकिन उसे अभी बहुत कुछ हासिल करना बाकी है। राज्य की वास्तविक सफलता उस दिन होगी, जब पहाड़ का युवा रोजगार के लिए अपना गांव छोड़ने को मजबूर नहीं होगा, जब दूरस्थ गांव की महिला को उपचार के लिए मीलों नहीं चलना पड़ेगा और जब विकास की रोशनी राज्य के अंतिम गांव तक पहुंचेगी। नौ नवंबर 2000 को जब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश से अलग होकर देश के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया, तब पहाड़ की आंखों में एक नए भविष्य के सपने थे। यह केवल एक नए राज्य का गठन नहीं था, बल्कि दशकों के संघर्ष, आंदोलन और बलिदान से उपजी उस जनभावना की जीत थी, जिसमें पहाड़ के लोगों ने अपने संसाधनों पर अपना अधिकार, अपनी समस्याओं का समाधान और अपनी संतानों के लिए बेहतर भविष्य मांगा था। उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने के बाद विकास की योजनाएं पहाड़ की जरूरतों के अनुरूप बनेंगी, गांवों से पलायन रुकेगा, युवाओं को रोजगार मिलेगा और दूरस्थ क्षेत्रों तक शिक्षा तथा स्वास्थ्य की सुविधाएं पहुंचेंगी। इन 26 वर्षों में राज्य ने कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। सड़क, बिजली, संचार, पर्यटन, शिक्षा और आधारभूत ढांचे के विस्तार ने उत्तराखंड की तस्वीर बदली है। राज्य की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुई है।
धार्मिक पर्यटन से लेकर साहसिक पर्यटन तक, आयुर्वेद से लेकर योग तक और प्राकृतिक सौंदर्य से लेकर सांस्कृतिक विरासत तक उत्तराखंड ने अपनी अलग पहचान बनाई है। लेकिन इन उपलब्धियों के बीच एक सवाल आज भी उतनी ही गंभीरता से खड़ा हैकृक्या अलग राज्य बनाने के लिए पहाड़ के लोगों ने जिन सपनों को देखा था, वे पूरे हो पाए हैं? क्या गांवों में खुशहाली लौटी है? क्या युवाओं को अपने घर के पास रोजगार मिल रहा है? क्या पहाड़ की माताओं और बहनों का जीवन पहले से आसान हुआ है? और क्या विकास की रोशनी राज्य के अंतिम गांव तक पहुंच पाई है?
उत्तराखंड के गठन के बाद सबसे बड़ा बदलाव प्रशासनिक पहचान और विकास की प्राथमिकताओं में आया। पहले पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याओं को एक बड़े राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर देखा जाता था। अलग राज्य बनने के बाद पर्वतीय भूगोल, प्राकृतिक आपदाओं, सीमावर्ती क्षेत्रों, वन आधारित आजीविका और ग्रामीण जरूरतों को केंद्र में रखकर योजनाएं बनाने की संभावनाएं बढ़ीं। राजधानी देहरादून प्रशासनिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना। हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में औद्योगिक विकास ने रोजगार और निवेश के नए अवसर पैदा किए। सिडकुल जैसे औद्योगिक क्षेत्रों ने राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। सड़क और बिजली की उपलब्धता में सुधार ने कई दूरस्थ क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज उत्तराखंड के अनेक गांवों तक सड़क पहुंच चुकी है। मोबाइल संचार और इंटरनेट ने लोगों की दुनिया बदली है। सरकारी सेवाओं का डिजिटल विस्तार हुआ है। शिक्षा के क्षेत्र में विद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों का विस्तार हुआ है। स्वास्थ्य सेवाओं में भी कई स्तरों पर सुधार के प्रयास हुए हैं। लेकिन विकास की यह कहानी पूरे राज्य में एक समान नहीं रही। मैदानी जिलों और पर्वतीय क्षेत्रों के बीच सुविधाओं का अंतर आज भी स्पष्ट दिखाई देता है। राज्य बनने के बाद विकास की दिशा तो बदली, लेकिन विकास का संतुलन अभी भी एक बड़ी चुनौती है। उत्तराखंड की स्थापना के 26 वर्ष बाद भी पलायन राज्य के सामने सबसे गंभीर सवालों में से एक है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर जीवन की तलाश में पहाड़ के गांवों से लोगों का शहरों की ओर जाना लगातार चिंता का विषय बना हुआ है।
कई गांवों में कभी आबाद रहे घरों के दरवाजे बंद हैं। खेतों में हल नहीं चल रहे। गांवों की पगडंडियों पर पहले जैसी चहल-पहल नहीं रही। बुजुर्ग अपने गांवों में रह गए हैं, जबकि युवा रोजगार की तलाश में देहरादून, दिल्ली, हल्द्वानी और दूसरे शहरों की ओर चले गए हैं। पलायन का असर केवल जनसंख्या पर नहीं पड़ता। इससे पारंपरिक खेती, स्थानीय संस्कृति, लोकभाषाओं, सामुदायिक जीवन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ता है। गांव खाली होने से जंगल और आबादी के बीच का संतुलन भी बदलता है। कई स्थानों पर खेती छोड़ने के कारण जंगली जानवरों की समस्या बढ़ी है। हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। कुछ गांवों में होमस्टे, बागवानी, जैविक खेती, स्थानीय उत्पादों और पर्यटन आधारित स्वरोजगार के माध्यम से नई संभावनाएं पैदा हुई हैं। युवा अपने गांव लौटकर नए प्रयोग कर रहे हैं।
औद्योगिक विकास ने विशेष रूप से मैदानी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाए हैं, लेकिन पर्वतीय जिलों में उद्योगों और स्थायी रोजगार के अवसर अपेक्षाकृत सीमित हैं। पर्यटन, कृषि, बागवानी, पशुपालन, वन आधारित उत्पादों और स्थानीय उद्यमों में रोजगार की व्यापक संभावनाएं हैं, लेकिन इन क्षेत्रों को पर्याप्त बाजार, प्रशिक्षण, निवेश और तकनीकी सहायता की जरूरत है।
सरकारी नौकरियां महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था केवल सरकारी नियुक्तियों के भरोसे मजबूत नहीं हो सकती। उत्तराखंड को ऐसी अर्थव्यवस्था की जरूरत है, जिसमें युवा नौकरी मांगने वाले ही नहीं, बल्कि रोजगार देने वाले भी बन सकें।
राज्य गठन के बाद शिक्षा के क्षेत्र में विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों का विस्तार हुआ। उच्च शिक्षा के अवसर बढ़े और कई क्षेत्रों में शैक्षिक सुविधाओं का विकास हुआ। लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों में विद्यालयों में विद्यार्थियों की घटती संख्या, शिक्षकों की कमी और विद्यालयों के बंद होने की समस्या चिंता का विषय है। दूसरी ओर, स्वास्थ्य सेवाओं में भी दूरी और उपलब्धता की चुनौती बनी हुई है। दूरस्थ गांवों के लोगों को विशेषज्ञ चिकित्सकों, जांच सुविधाओं और आपातकालीन उपचार के लिए जिला मुख्यालयों या मैदानी क्षेत्रों की ओर जाना पड़ता है।
धार्मिक पर्यटन के साथ साहसिक पर्यटन, योग, आयुर्वेद, ग्रामीण पर्यटन और होमस्टे ने नई संभावनाएं पैदा की हैं। पर्यटन से होटल, परिवहन, स्थानीय व्यापार, हस्तशिल्प और रोजगार के अनेक अवसर जुड़े हैं। लेकिन पर्यटन का बढ़ता दबाव पर्यावरणीय चुनौतियां भी पैदा कर रहा है। अनियोजित निर्माण, यातायात का दबाव, कचरा प्रबंधन, जल संकट और संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ती गतिविधियां गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।